दो सेकंड में होगी यूरिन में प्रोटीन की जांच, खर्च मात्र 40 रुपए

नीता सिसौदिया | इंदौर .एमजीएम मेडिकल कॉलेज के फिजियोलॉजी विभाग के डॉक्टर ने सिंटीग्लो नाम की डिवाइस बनाई है। इससे 40 से 50 रुपए में ही महज दो सेकंड में माइक्रो-प्रोटीन (यूरिन में प्रोटीन की जांच) हो सकेगी। प्रारंभिक अवस्था में किडनी की बीमारी का पता लगाया जा सकेगा। संभवत: अगले महीने नई दिल्ली में होने जा रहे ग्लोबल बायो इंडिया एरोसिटी में इसे लॉन्च किया जाएगा।

डिवाइस को बनाने वाले डॉ. पंकज पाराशर बताते हैं कि किसी व्यक्ति की किडनी में खराबी आने पर सबसे पहले उसकी यूरीन में प्रोटीन बढ़ता है। बाजार में प्रोटीन की जांच कराने पर 500 से 600 रुपए का खर्चआता है। कई दफा बीमारी पकड़ में आए, तब तक देर हो जाती है। वर्तमान में प्रयोगशालाओं में इस जांच के लिए ऑटो-एनालाइजर मशीन का उपयोग किया जाता है।

बतौर ट्रायल एम्स में की गई मरीजों की जांचइस मशीन के परिणामों का पता लगाने के लिए ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (एम्स) में ट्रायल किया गया। डॉक्टरों ने मरीजों की सिंटीग्लो और ऑटो-एनालाइजर से जांच की। दोनों मशीनों से प्राप्त परिणामों का अध्ययन किया। सिंटीग्लो मशीन से मिले परिणाम 95 फीसदी सटीक थे। एम्स के अलावा आईआईटी दिल्ली की प्रयोगशाला में भी चार हजार नमूनों की जांच इस मशीन से की गई है। वहां इसके परिणाम 97 फीसदी सटीक मिले।

स्ट्रिप्स के इस्तेमाल से प्रारंभिक अवस्था में बीमारी पकड़ नहीं पातेयूरीन में प्रोटीन का पता लगाने के लिए स्ट्रिप्स-पद्धति का भी इस्तेमाल किया जाता है। उसे यूरीन में डूबाते है। रंग बदलने पर बीमारी का अंदाजा लगाते हैं, लेकिन विशेषज्ञ बताते हैं कि इस पद्धति से बीमारी का पता प्रारंभिक अवस्था में नहीं लगाया जा सकता है। जब बीमारी का पता चलता है, तब देर हो जाती है।

इनोवेशन के लिए लंदन की फैलोशिप मिलीइस मशीन को बनाने पर ब्रिटिश सरकार की रॉयल एकेडमी ऑफ इंजीनियरिंग लंदन ने डॉ. पाराशर को एक फेलोशिप भी दी है। लीडर्स इनोवेशन प्रोजेक्ट के तहत उन्हें इसके लिए चुना गया है। वे बताते हैं कि इसे बाजार में लाने की प्रक्रिया चल रही है। स्टार्टअप की मदद से इस मशीन को पब्लिक डोमेन में लाएंगे

स्वस्थ व्यक्ति की यूरीन में नहीं पाया जाता है प्रोटीनस्वस्थ्य व्यक्ति की यूरिन में प्रोटीन नहीं पाया जाता है। जिनकी किडनी में खराबी आने लगती है, तब यूरिन में प्रोटीन आने लगता है। इस अवस्था को माइक्रो एल्बोमिन यूरिया कहते हैं। यूरिन में प्रोटीन दो से 20 मिलीग्राम होने पर ही समस्या का पता चल जाए तो किडनी बचाई जा सकती है। प्रोटीन इससे ज्यादा होने पर बचाना मुश्किल होता है। ऐसे में डायलिसिस या प्रत्यारोपण की जरूरत होती है।

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